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उलझा पंछी नभ में

उलझा पंछी नभ में

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मेरे मन का पंछी उड़ता था,

जो उन्मुक्त गगन में,

उलझा-सा रहता है,

आजकल नभ में।


हवा के झोंके-सा जो,

उड़ बहता रहता,

उलझा-सा रहता,

ओझल से दायरों में।


बरसात के बाद अपने,

आँगन में उड़ती तितलियों को,

देख कुछ यो सोचा की,

हम हैं कहाँ,

खुले नभ में उलझे से।


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