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Uma Shankar Shukla

Tragedy

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Uma Shankar Shukla

Tragedy

उजालों पर लगे पहरे

उजालों पर लगे पहरे

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उजालों पर लगे पहरे अँधेरा सर उठाता है।

हर इक मासूम खुशियों के चरागों को बुझाता है।।

अभावों में गरीबों  की  है पलती जिन्दगी ऐसे,

कि जैसे जाल में कोई परिन्दा फड़फड़ाता है।


खिलते रोज आशाओं के फूल दिल में यूँ उनके, 

घरौंदा रेत का कोई बनाकर फिर मिटाता है।

मुसीबत से भरी राहों पे गिर-गिर कर यही जाना, 

कि जीवन  में  सम्हलने का हुनर ठोकर सिखाता है।


बिछाए फूल  सच्चाई के  हमने राह पर जिसके, 

छलावे और धोखे का वही काँटा चुभाता है।

लिए नकली मुखौटों में घिनौने चित्र साजिश के, 

सियासी घात शहरों में सियासत की लगाता है।


सिवा दुःख दर्द दुश्वारी के मुफलिस को मिला है क्या, 

पसीना बेंचकर अपना फकत आँसू कमाता है।

बिना अपराध के मिलतीं सजाएं अब निरीहों को, 

असल में है जो हत्यारा सजा से छूट जाता है।


खबर किसको है कब लग जाय पाबन्दी हवाओं पर, 

गुलामी आज भी मन के किवाड़ें खटखटाता है।


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