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Rashmi Jain

Tragedy


2.0  

Rashmi Jain

Tragedy


उड़ान

उड़ान

2 mins 287 2 mins 287

वो देखो शिकारी आया 

संग अपने है धनुष बाण लाया 

डोरी खिंची तीर चलाया 

मेरे पंखों को है निशाना बनाया 

निर्जीव सी काया हुई लहूलुहान ,

गिरी धम से धरती की कोख में, 

भेदा मेरे हर अंग को 

पर मेरी जिद को तोड़ ना पाया ।


मिट्टी की मरहम लगा 

एक लम्बी साँस भर आस की 

फिर आकाश को निहारा 

काश की थी ना कोई गुंजाइश 

टूटे पंखों को लपेट ,

ली फिर एक उड़ान ख़ुद को समेट।

 

देखो वो शिकारी बाज़ ना आया 

जाल बिछा मुझे फिर क़ैद करने आया 

पिंजरे में मैं रहती कैसे ?

बहती हवा हूँ ,

मुझे बाँध पाता कैसे ?

यह देख शिकारी हुआ हैरान ,

सोच पड़ा 

हर बार कैसे हुआ वो नाक़ाम ।


फिर एक दिन आया  

किया एक आख़री फ़ैसला 

तन से अलग कर दिया उसने सर मेरा 

मुझ पर कर एक अंतिम बार

क्योंकि उसे क़बूल ना थी अपनी हार । 

पर नादान था वो 

ना समझ सका 

ना भाँप सका 

ना माप सका 

बिन पंखों वाले कोशिशों की उड़ान ,

मेरी ख़्वाहिशों की ऊँची उड़ान, 

कैसे रोकेगा अब मेरी रूह की उड़ान ,

फिर लौट आउंगी भरने उंची उड़ान।


 किसी ने ख़ूब कहा है,

मेरी उड़ान की पहुँच देखनी हो तो 

आसमान को कह दो 

थोड़ा और उँचा उठ जाए ,

पर मैं तो कहूँगी ,

मेरी उड़ान की पहुँच देखनी हो तो 

आसमान को कह दो रास्ते से ही हट जाए 

क्योंकि ,

अब ना मैं मानूँगी  

ना रुकूँगी, 

ना झुकूँगी ,

ना थकूँगी ,

ना हारूँगी ,,

ये मैं नहीं 

आज़ सर पर चढ़  

ये है मेरा जुनून बोला ,

आज़ सारे ख़्वाहिशों की पोटली खोला 

बस उड़ लेने दे आज जी भर,

कल को है किसने देखा।



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