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Dhirendra Panchal

Abstract


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Dhirendra Panchal

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तुम्हारी बस्ती में

तुम्हारी बस्ती में

1 min 216 1 min 216

वो तो करने आएंगे आघात तुम्हारी बस्ती में

हाथ जोड़कर बोलेंगे कुछ बात तुम्हारी बस्ती में

जात पात सब भूल भुलाकर तुमको गले लगाएंगे

बेचेंगे वो खड़े खड़े जज्बात तुम्हारी बस्ती में


दोहराएंगे नये नये अध्याय तुम्हारी बस्ती में

बड़े बुजुर्गों को भी देंगे राय तुम्हारी बस्ती में

कुछ पूछोगे पिघल जाएंगे हँसकर तुमसे लिपट जाएंगे

फिर बोलेंगे बहुत हुआ अन्याय तुम्हारी बस्ती में


खुद का करने आएंगे उद्धार तुम्हारी बस्ती में

जीतेंगे तो भड़केंगे अंगार तुम्हारी बस्ती में

सोच समझकर अपने मत का करना तुम उपयोग

वरना खुल जाएगा गुंडों का व्यापार तुम्हारी बस्ती में



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