सबको राह दिखाएँ कैसे
सबको राह दिखाएँ कैसे
जिसका मन व्याकुल ना हो
हम उसको प्रेम सिखाएं कैसे ?
जिसमें बाकि तड़प नहीं है
उसको गले लगाएं कैसे ?
जिसमें बाकि बचा न हो
नरमाहट,आहत हो जाने दो
उसके मन की फूलवारी तक
माली को पहुंचाएँ कैसे ?
चित्कार हृदय में रहने दो
उल्लास कंठ तक मत लाओ
कुछ ख़ामोशी भी जायज है
एक एक बात बतायें कैसे ?
चलने वाली हृदय गति को
बार बार मैंने समझाया
मन के मरुथल में अपने हम
एक एक पेड़ उगाएं कैसे ?
कुछ बूंद आँखों से बाहर
आकर ये सिखलाती हैं
बन्द कमरे में पड़े पड़े हम
अनुभव को पढ़ पाएं कैसे ?
दिशाहीन हैं खुद की साँसे
सबको राह दिखाएँ कैसे ?
~ धीरेन्द्र पांचाल

