ट्रेन का जनरल डिब्बा
ट्रेन का जनरल डिब्बा
ऐसा भी दुखानुभव हुआ...
एक रोज़ जब ट्रेन के जनरल डिब्बे में
मजबूरन चढ़ा...
बोकाजान से गुवाहटी को निकला
और फिर गुवाहाटी से डिमापुर तक का
ट्रेन के जनरल डिब्बे में
मजबूरन सफर किया...!
क्या अजब भीडभाड थी...
क्या धक्का मुक्की और पसीने की बदबू...
कभी शौचालयों की बदबू
और कभी अपनी सीट पाने की होड़ में
मल्लयुद्ध सम ट्रेन की जनरल डिब्बे की हालत...
ये कैसा हाल बेहाल...
आधे नींद में, आधे जगे...
अपने सामानों पर पैनी नज़र...
बैठे-बैठे गर्दन दर्द...बेकार सरदर्द...
कहीं सब्जियों की बोड़ी तो कहीं
सामानों को बेचने की होड़...
फिर वही धक्का मुक्की...
कहीं पर हंसी के फव्वारे, तो कहीं उदास चेहरे...
बेचारे जो खड़े-खड़े लाचारी में
सफर करते,
कभी इससे, तो कभी उस्से सीट में
थोड़ी सी जगह की मांग करे...
विनती करते, तो कभी अपने बाहुबल का
प्रयोग करते...
देश-विदेश की बातें करते...
कभी सरकार की, तो कभी
विरोधी दलों की बातें करते...!
किसी को व्यापार की चिंता,
तो किसी को अपने परिवार की...!
कोई मोबाइल फोन पर अपनी नज़रें गढ़ाकर
बैठे-बैठे ही सफर करते...
कोई गगनचुंबी ईमारतें बनाने के
कोरे सपने बुनते,
तो कोई बड़ी-बड़ी बातें करते...
किसी को शौचालयों से असुविधा, तो
किसी को ट्रेन की जनरल डिब्बों की
बुरी हालत पे गुस्सा...
कोई बादाम चबाते-चबाते छिलके वहीं
ट्रेन के डिब्बे में ही
बिना सोच-विचार किए ही
यहाँ-वहाँ फेंका करते...
कोई चाय-काफी पीते और
बिस्किट-केक आदि से
अपनी पेट की आग बुझाते...!
कोई रोटियों और सब्जियों से
अपना पेट भरते, तो कोई चावल खाते...
यूँ ही होती है ट्रेन की यात्रा...
यही है जनरल डिब्बे की व्यथा-कथा...
क्या आपने भी कभी ट्रेन के
जनरल डिब्बे में सफर किया...?
