तृप्त प्रेम
तृप्त प्रेम
एक गहरा सुकून ,एक अजब खामोशी ,
अतरंग क्षणों के बाद ,तृप्त प्रेम की मदहोशी।
ज्वार - भाटा सा वेग ,चारों तरफ था छाया ,
जिसमे विवश होकर ,प्रेमी हृदय ललचाया।
ये प्रेम जाल सबको ,देता ऐसा फँसाये ,
जिसमे से प्रेमी - युगल ,कभी निकल ना पाये।
चाहे समय हो कोई ,बस प्रेम ही प्रेम सुहाये ,
ये प्रेम की अगन ऐसी ,जो जलता दिया बुझाये।
चारों तरफ हो जाता ,तब दो ज़िस्मों का घेरा ,
अतृप्त आत्मायें लिपटकर ,लगाती तृप्ती का फेरा।
कभी एक - दूसरे पर ,हो जाते दोनो कुर्बान ,
कभी सिमट बाहों में ,ले आते खूब तूफान।
जब तक अगन अधूरी ,तब तक ना कोई दूरी ,
गर्म साँसों के बंधन से ,होती हर इच्छा पूरी।
काफी ज़द्दोजहत पर ,बंद पलकें छोड़े आन ,
भीग गए दोनो तन ,तृप्त प्रेम से बढ़ा मान।
एक गहरा सुकून ,एक अजब खामोशी ,
अतरंग क्षणों के बाद ,तृप्त प्रेम की मदहोशी।

