तलाश
तलाश
सुबह की पावन बेला में,
मद्धिम-मद्धिम ऊर्जा से परिपूर्ण
सूर्य की सुनहरी किरणों में,
मैं तलाश रहा हूँ खुद को।
अहाँ कितना ऊर्जावान मैं
कितना शान्तिमय सारा ब्रम्हाण्ड।
एकटक होकर निहारता
खो जाना चाहता हूँ, मैं होकर एकाकार।
दोपहर की निर्जन दोपहरी
सब कुछ वीराना-वीराना सा
सड़के सुनसान, दूर-दूर तक फैला सन्नाटा
इन सन्नाटों मे, दौड़-दौड़ कर
मैं तलाश रहा हूँ, खुद को।
देखो सूर्य छुपा जा रहा है
मद्धिम-मद्धिम बुझा-बुझा सा
हवा के हल्के झोंकों में
खुद को निहारता, सब कुछ भी खोकर
हक्का-बक्का सा, मैं तलाश रहा हूँ खुद को।
रात्रि पहर की शुरुआत
और चन्द्रमा की शीतलता
चाँदनी की जगमगाहट में घीरा
मानो स्वर्गलोक में,
विचरण करता एक पथिक
कितनी शान्ती, कितना आनन्द
नभ को एकटक देखते हुये
शायद खुद को तलाश रहा हूँ मैं॥
यह तो चक्र है जीवन का
जहाँ से शुरू, वहीं पर सब खत्म
मै घुम-घुम कर, फिर स्वयंभू को पाता वहीं पर
सब कुछ नश्वर है, सब छलावा है
सब दिखावा है, सब माया है।
एक पल पलकों को मूंद कर,
मै तलाश रहा हूँ स्वयम् को
