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Prashant Srivastava

Inspirational

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Prashant Srivastava

Inspirational

​मिट्टी से पैदा हुवे

​मिट्टी से पैदा हुवे

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​मिट्टी से पैदा हुवे, मिट्टी में मिल जाना है,

सोचो, कितना दूर हमें जाना है।

एक श्वाँस का आना फिर एक श्वाँस का जाना है,

इतनी छोटी ज़िन्दगी पर सोचो क्यो इतराना है।

​सब भाग रहे ईधर उधर अनायस ही,

पता नही किस को किधर-किधर जाना है।

धर्म, जाति मजहब में बँटे सारे,

दौड़-दौड़ कर एक दिन थक जाना है।

मिट्टी से पैदा हुवे, मिट्टी में मिल जाना है।

​राम मेरे, अल्लाह तेरे ऐसे तो भगवान बहुतेरे,

इस गुत्थम-गुत्थी में सोचो क्या पाना है?

एक पल मुट्ठी बन्द पड़ी जो अगले पल खुल जाना है

मिट्टी से पैदा हुवे, मिट्टी में मिल जाना है।

​एक ईश्वर, एक धरा, एक आकाश,

सब मिलकर एकाकार हो जाना है।

मेरी हस्ती क्या है...

मिट्टी से पैदा हुवे, मिट्टी में मिल जाना है।


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