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Prashant Srivastava

Classics

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Prashant Srivastava

Classics

० - शून्य से अनन्त तक - \infty

० - शून्य से अनन्त तक - \infty

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प्रारम्भ है, सफर है विकास का

शून्य से अनन्त तक !

शून्य से शुरू हुआ... बढ़ रहा हरेक पल ।

बूंद-बूंद जुड़ रहा, चल रहा मैं चल रहा,

शून्य से अनन्त तक ।

शून्य से शुरू हुआ, अनन्त पर खत्म हुआ,

यह मेरा प्रवाह है, यह मेरा प्रयास है ।

आत्म बल मेरा आत्मबल ।

रुका न था, रुका न हूँ ना रुकूँगा मैं,

यह मेरा आत्मबल ।

चल रहा मैं चल रहा शून्य से अनन्त तक ।

शून्य के आगे जुड़ गया, तो मैं शून्य की पहचान हूँ,

मेरे पीछे बढ़ता शून्य, हो रहा मैं बलवान हूँ ।

यह सफर है अनन्त का - \infty

चल रहा मैं चल रहा - शून्य से अनन्त तक ।

भाग्य बदलेगा या नहीं क्या पता

समय बदलता है, ये हमें पता ।

हर पल ये बता रहा मैं बढ़ रहा ।

देख मेरी मंजिलें है कितनी पास,

विजयी मैं बनूँगा यही मेरा प्रयास ।

चल रहा मैं चल रहा, शून्य से अनन्त तक ॥


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