प्रशान्त
प्रशान्त
आशाओं की इस नगरी में, निराश हूँ मैं,
न जाने क्यों जिन्दगी से उदास हूँ मैं॥
प्रशान्त नाम है मेरा, लेकिन अशान्त हूँ मैं,
न जाने क्यों जिन्दगी से उदास हूँ मैं॥
नीत सोचता हूँ आज तो खुशगवार है फिजा,
पर ढलती शाम में नजर आती है खिजॉं॥
जीवन के इस सफर में न कोई हमसफर है मेरा,
पर न जाने क्यों तलाशता हूँ मैं एक दिशा॥
दोपहर की निर्जन दोपहरी ही सुहाती है मुझे,
शायद तन्हाईयाँ ही हमसफर है मेरा॥
दुनिया के इस भीड़ में खो न जाऊँ कहीं,
यही सोचकर कि गुम हो न जाऊँ कहीं,
शायद जिन्दगी से निराश हूँ मैं॥
धरा का कोई भी कोना नहीं है मेरा होना,
फिर भी न जाने क्यों जिन्दगी से उदास हूँ मैं॥
आशा तो माया है, फिर माया तो एक छाया है
जिन्दगी को यूँ ही मैंने गम में बहाया है,
खोजता हूँ अपने आप को भटका हूँ कहाँ
शायद इसीलिए अपने आप से उदास हूँ मैं॥
