आलोचना (Aalochna)
आलोचना (Aalochna)
आलोचना है एक अनमोल उपहार।
स्वयम् को तराशने का एक श्रेष्ठ विचार।।
यदि मंथरा के कटाक्ष, कैकयी को न चुभते,
यदि कैकयी की शर्तें, दशरथ के हृदय को न चीरते।
तो सोचो क्या राम 'मर्यादा पुरुषोत्तम' बन पाते?
सत्य यह, आलोचना है एक अनमोल उपहार।
स्वयम् को तराशने का एक श्रेष्ठ विचार।
रजक की बातें थी तीखी,
तभी तो ईश्वर तुल्य राम को भी कर दी व्यथित।
यदि राम ने सीता को बनवास न भेजा होता,
तो क्या सीता जगत की आदर्श बन पाती?
क्या सत्ययुग, क्या द्वापर, क्या कलियुग,
हर युग में था, है, और चीरन्तर रहेगा।
आलोचना है एक अनमोल उपहार,
स्वयम् को तराशने का एक श्रेष्ठ विचार।
शब्द आलोचना के जब श्रवण द्वार को बेधते हैं,
चंचल मन को भी झंकृत कर देते हैं।
दिशा बदल देते हैं कुछ शब्द,
पुरुष को भी महापुरुष बना देते हैं कुछ शब्द।
सत्य यह, आलोचना है एक अनमोल उपहार,
स्वयम् को तराशने का एक श्रेष्ठ विचार।
जब कभी हम असफल हो जाते हैं,
कुछ कटाक्ष वचनों से जब व्याकुल हो जाते हैं।
तुरंत तलाशते हैं हम स्वयम् को,
ढूंढ लेते हैं स्वयम् की खामियों को।
बना लेते हैं अपनी राह, हो जाती हैं मंजिले आसान।
क्योंकि, आलोचना है एक अनमोल उपहार,
स्वयम् को तराशने का एक श्रेष्ठ विचार।
