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Prashant Srivastava

Inspirational

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Prashant Srivastava

Inspirational

​मेरा घर

​मेरा घर

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​घर महल भले न हो, पर चहल-पहल ढेर सारे हो।

बच्चों का कोलाहल हो, दादाजी की मुस्कुराहट हो।

खेले बाल गोविन्द आँगन में,

दादाजी बोले हरे कृष्ण, हरे कृष्ण मन में।

सुबह की बेला में,

हर लफ्ज़ पे भजनों की गुनगुनाहट हो।

घर महल भले न हो, पर चहल-पहल ढेर सारे हो।

​मेहमान कभी आये घर पे,

स्वागत में हर कोने की सजावट हो।

जाते समय वो गले लगे,

रिश्तों में एक जोश भरा गर्माहट हो।

घर महल भले न हो, पर चहल-पहल ढेर सारे हो।

​एक बड़ी खिड़की हो हर कमरे में,

जिससे दिखे चाँद सितारे।

जब कभी आँख खुले आधी रात में,

और नज़रें हो आकाश में।

मन पुलकित हो जाये,

खो जाये फिर से नींद के आगोश में।

सपनों में लगे,

स्वर्ग से भी सुन्दर घर हमारा हो।

घर महल भले न हो, पर चहल-पहल ढेर सारे हो।

​बच्चे बोले गुड मॉर्निंग,

सुप्रभात से पड़ोसियों का स्वागत हो।

नाश्ते की मेज पर,

भले न हो मेवा मिश्री।

गुड़-रोटी खाकर भी,

सभी सही सलामत हो।

घर महल भले न हो, पर चहल-पहल ढेर सारे हो।

​श्रीमती के साथ खटपट हो,

पर हँसी ठहाके हो।

कभी-कभी बड़ों की डाँट पड़े,

पर मस्त नज़ारे हो।

कभी बच्चे पढ़े कमरे में,

कभी छत पर खेल हज़ारों हो।

थक कर सो जाये वही,

फिर भी सब सही सलामत हो।

घर महल भले न हो, पर चहल-पहल ढेर सारे हो।

​सुना है एक पीढ़ी बीत जाती है घर बनाने में,

पर कई पीढ़ियों से संजोया घर हमारा हो।

कौन कहता है स्वर्ग नहीं देखा,

स्वर्ग से सुन्दर घर हमारा हो।

घर महल भले न हो, पर चहल-पहल ढेर सारे हो।

​धीरे-धीरे कट जाय समय,

हम भी बन जाये वरिष्ठ।

अनुभव लेकर लाठी टेके,

पर बुढ़ापे में भी जवानी कायम हो।

मरना तो सभी को है,

पर मय्यत पर भी आँखों में पानी न हो।

अब नये सफर में,

चलने के जज़्बात हमारे हो।

घर महल भले न हो, पर चहल-पहल ढेर सारे हो।

— समाप्त —


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