तिश्नगी The Soul That Waited
तिश्नगी The Soul That Waited
बंद किताब की किस्मत भी क्या,
न कोई खोलता है,
और खोलता भी है कोई तो,
आधा पढ़कर फेंक जाता है...
अब वो बंद किताब भी,
इस किताबखाने के एक छोटे से,
जाल को अपना सुकून मानती है...
उसने इस अँधेरे को अपना हमसफ़र,
और इस किताबखाने को,
अपना आशियाना मान लिया,
जहाँ न उसे कोई परख सके,
न ही उसे कोई कोस सके...
कितने राहगीर आए और गए,
मगर कोने में पड़ी उस बंद किताब को,
कोई नहीं देखता,
कोई नहीं पढ़ता...
फिर एक दिन एक राहगीर आया।
उसने सारी किताबें देखीं, पढ़ा भी,
मगर न जाने क्यों,
उसे उस बंद किताब को पढ़ने की दिलचस्पी हुई,
जिसे कभी किसी ने नहीं पढ़ा था...
वो धूल झाड़कर,
इस किताब को अपने पास लाया,
कुर्सी पीछे खिसकाई और बैठकर,
उस किताब के शीर्षक को,
बड़े ध्यान से पढ़ा...
उसके शीर्षक पर लिखा था ~
“मैं हूँ अनकहे अल्फ़ाज़।”
इतना पढ़ते ही,
उसकी दिलचस्पी और बढ़ने लगी...
वो एक लेखक भी था,
उसे लगा कि शायद,
ये किताब वही रास्ता है,
जिसे वह सालों से ढूंढ़ रहा था,
जो उसे खुद से मिला दे...
और वो उस किताब को पढ़ने लगा,
बल्कि उसके हर भाव को,
महसूस करने लगा...
कुछ भाव उसमें ऐसे थे,
जिन्हें पढ़कर उसकी आँखें नम हो गईं,
वो शांत तो हुआ,
मगर उसने पढ़ना नहीं छोड़ा...
आधी पढ़ी थी उसने किताब,
और उसने सोचा कि वो इस किताब को,
अपने साथ, अपने घर ले जाएगा,
और इसे पढ़कर मुकम्मल करेगा...
किताब ने सोचा,
इतने सालों के बाद,
शायद आज एक ऐसा दिन आया है,
जहाँ एक मुसाफ़िर ने, मुझे सिर्फ़ पढ़ा नहीं,
बल्कि मेरे हर दर्द, हर एहसास को जिया भी है...
मैंने देखा उस राहगीर के नम आँखों को,
जहाँ उसका अपना दर्द,
साफ़-साफ़ झलक रहा था...
मैंने महसूस किया उसके धड़कते दिल को,
जो शायद प्रेम के लिए,
हमेशा तरसता रहा...
भले ही बंद किताब थी,
मगर पढ़ने वालों के,
अनकहे एहसास,
हम भी पढ़ लेते हैं...
हम नहीं हैं नूतन कल की,
उस डिजिटल किताब की तरह,
जिसे एक क्लिक में पढ़ लिया जाता है...
महसूस की हो जिसने कभी,
पुरानी किताबों की वो सोंधी-सी महक,
पन्ने पलटते ही,
वो ज़रूर अपने सुकून से मिल गया होगा...
इसलिए,
हम पुराने ही ठीक हैं,
मुझे पढ़कर उस मुसाफ़िर ने,
जैसे मुझे ज़िंदा कर दिया हो...
दबे शब्दों को महसूस करके,
उन्हें पंख दे दिया हो...
सुकून है बारिश-सा
उसकी आँखों में,
शायद बिछड़ा है वो भी कभी,
तभी तो उसने इसमें लिखे किरदार को,
इतना अपना माना है...
किसी ने नहीं पढ़ा होगा उसे,
मगर ये अनकही किताब,
अब उसे समझने की कोशिश में लगी है,
शायद पढ़ भी ले,
उसके दिल को...
अज़ीज़ है वह राहगीर मेरे लिए,
जिसने इस नाचीज़ को अपना माना है,
सँभाला है,
और बेइंतहा प्रेम से रखा है...
वरना मैंने तो सोच लिया था,
कि ये किताबखाना ही,
मेरा आख़िरी आशियाना और सुकून है...
मर गई थी ये आस,
कि हमें भी कोई पढ़ेगा...
हम भी बाहर की चकाचौंध देख पाएँगे,
अँधेरे के बाहर भी,
इतनी सुंदर दुनिया सजी है,
ये जान पाएँगे...
आज मुझे हर रोज़ पढ़ा जाता है,
समझा जाता है,
शुक्रिया उस राहगीर का,
जिसने मुझे उसका आईना समझा,
उसका सुकून माना...
सँभाला ऐसे,
जैसे उसे प्रेम हो,
इस किताब में लिखे हर शब्द से,
हर एहसास से,
जो शायद उसे,
आज भी उसी से जोड़कर रखता है...
