STORYMIRROR

Mayank Kumar

Abstract

4  

Mayank Kumar

Abstract

थोड़ी बाहें खोलो तुम भी

थोड़ी बाहें खोलो तुम भी

1 min
453

जब कभी वह नदी की तरह मुझ में आकर मिली

मैंने किसी व्याकुल समंदर सा खुद की सीमाएं खोली


देखो ना मुझ में समाहित होकर वह कैसे इतरा रही हैं

मुझ में ही मिलकर मुझसे ही खुद को समंदर बता रही हैं


ए खुदा तू ही बता हर वक्त ऐसा क्यों होता है ?

सभी बंधन को तोड़कर दूसरों को खुशी देने वाला


किसी की नजरों में हर एक पल क़ातिल क्यों होता है ?

जब सैलाब आती है किसी समंदर के अंदर तो फिर


गुजरा हुआ सारा मंजर किसी का जीवन क्यों होता है ?

आख़िर सैलाब लाने वाला भी तो गुजरा हुआ मंजर ही है


आख़िर कोई समंदर कितना पीर का भार लिए बहेगा

कभी ना कभी तो सुंदरता का विध्वंसक शिव वह बनेगा


जब-जब स्वच्छ नदी के संग मैली यमुना समंदर में मिलेगी

तब-तब शिव सा कोई समंदर सती की याद में रूद्र रूप में आएगा।


मानवता को अपनी व्याकुलता वह बताएगा।

फिर हम क्यों कहते हैं ? समंदर विध्वंसक हो गया।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract