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Priyanka Saxena

Abstract

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Priyanka Saxena

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थाह ऑ॑खों की

थाह ऑ॑खों की

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ऑ॑खों के सिवा, 

कोई दरिया हो या समंदर हो,

हर डूबने वाले को मालूम है गहराई।


तन्हाई हो या कि मेला हो, 

साथ हो या विरह हो,

आँखों से झलकता, बयान होता,

शिकवा भी, मनुहार भी, 

क्रोध भी, प्यार भी,


शैतानियां भी, मासूमियत भी, 

शिकायत भी, खिलखिलाहट भी,

नाराज़गी भी, मुस्कुराहट भी,


शर्मिंदगी भी, गौरवान्वित भी,

कठोर भी, कोमल भी, 

जड़ भी, कोपल भी,

अहंकार भी, विनम्र भी, 


लुप्त भी, साक्षात भी,

अनजानी भी, पहचानी भी, 

नादान भी, मानिनी भी।


सार है, मर्म है,

सभी रसों का श्रृंगार है,

आँखों की पलकों में

समाया समस्त संसार है।


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