तेरा हुनर फिर किस बात का डर
तेरा हुनर फिर किस बात का डर
राज़ की एक बात बताता हूँ
मैं सच बोलता हूँ और सुनाता हूँ
हर वक़्त एक जैसा नहीं होता
कभी समुंदर में मोती नहीं होता
हालात बिगड़ते देर नहीं लगती
सपनो के टूटने की ख़बर नहीं मिलती
बस एक हौसला काम तेरे आता हैं
जो आशा का दीप जलाता हैं
बंजर रेत को भी उपजाऊ जो कर जाए
वो ही हैं हिम्मत, जो आगे बढ़ जाए
कांटें राहों में किसको नहीं मिलते
वो लक्ष्य ही क्या, जो हैं आसानी से मिलते
अटक मत भटक मत इस दुनिया में आ के
मिलेंगे लाखों पड़ाव, तेरी हर मंज़िल में आगे
देख परख कर क्या बात हैं तुझमें?
किस हुनर की क़ीमती पहचान हैं तुझमें?
इन् आँसुओं को पोंछकर, तू आगे तो बढ़
क्या हुआ जो मिली हैं हार, इस बार अगर
धीरे धीरे ही सही तू पतवार बना
अपने आप को चमकता हीरा बना
तू हारकर भी इक दिन जीत जाएगा
फिर तू शायद इंसान कहलाएगा।
