तड़प।
तड़प।
जब तुम ओझल होते इन नैनों से।
हृदय तडपत है तुम बिन एसे, जुदा होता प्रीतम, सजनी से।
ढूँढ रहा तुमको गलियन में, पूछ रहा मंद सुगंध पवन से।
जगह-जगह वह हर पल सताती, मिले थे जहाँ हम एक दूजे से।
रोम- रोम में तुम इस कदर समाई, निर्जीव है काया बिन साँसों से।
जीना हुआ है दुश्वार हमारा, कर न सका इजहार तुमसे।
कब तलक तुम में मिलना होगा, धीर टूटा जाता अब मन से।
" नीरज" को अब तो अपना बना लो, डर लगता बैरी दुनिया से।
