स्वतंत्रता एक भ्रम
स्वतंत्रता एक भ्रम
मैं अपने घर के
अहाते में कैद हूं लेकिन
घर के जिस कमरे में रहती हूं
वहां स्वतंत्र
मैं कहां हूं
किस कोने में पड़ी हूं
क्या कर रही हूं
कैसा महसूस करती हूं
क्या कुछ करना चाहती हूं
जिंदा हूं तो किस हाल में हूं
मर भी गई तो क्या फर्क पड़ेगा
जिंदा भी एक मृत के समान ही हूं
ऐसी स्वतंत्रता से भी क्या लाभ जिसमें
कोई खोज खबर लेने वाला ही न हो
खुद में पूर्ण
फिर भी अधिकतर लोग
इस कोशिश में रहते हैं कि
मेरे मन में एक विचार उपजाने में
हो पायें वह सफल कि
मैं हूं अपूर्ण
कुछ लोग हैं मेरी जिंदगी में जो
मेरे करीबी हैं
रिश्तेदार हैं
दोस्त हैं
उनसे जब भी कोई वार्तालाप करो तो
मन अतीत के बुरे अनुभवों को भुलाकर
यही उम्मीद करता है कि
उनसे थोड़ी खुशी,
आत्मसंतोष,
अपनेपन का अहसास,
मानसिक शांति,
भावनात्मक स्थिरता आदि
कुछ तो मिले लेकिन
हाथ लगती है
बेरुखी,
मायूसी,
खंजर सा दिल में उतारती उनकी
तीखी जहर उगलती
प्रतिशोध की आग में जलती
बदले की कार्यवाही सी करती
किसी का चरित्र हनन सा करती
उसकी आत्मा को विचलित करती
वाणी
दूर से ही किसी ने तेजाब के
छींटे उछालकर
मुझे जलाने की भरसक
कोशिश करी
मेरे पंख जला दिये
अभी तो मैं उड़ी भी नहीं थी
स्वतंत्रता तो हर किसी को बस
अपने तक सीमित हो तो
अच्छी लगती है
दूसरे की स्वतंत्रता
उसका समर्पण
उसकी सादगी
उसका सौंदर्य
उसका स्वाभिमान
उसका संयमित एवं संतुलित
व्यवहार
उसकी मृदु वाणी
उसका स्वच्छ आचरण
उच्च विचार
कहने को यह सब गुण हैं लेकिन
लोगों को पसंद नहीं आते
घर ही एक सबसे बड़ी इस संसार की
कैद है जिसमें
व्यक्ति आंखों से देखने पर ही
एक स्वतंत्र प्राणी सा प्रतीत होता है पर
यह एक भ्रम है
घर के ही निष्ठुर अन्य सदस्य
उसकी सांसों तक पे पहरे लगा देते हैं
उसके दम घोंट देते हैं
उसके साथ यह व्यवहार तब तक करते
रहते हैं जब तक कि
वह निष्प्राण न हो जाये।
