सूरज फिर मुस्कराएगा..
सूरज फिर मुस्कराएगा..
देख लेना फिर सूरज
खिल खिला के मुस्कराएगा
पत्ता पत्ता डाली डाली
आगोश में मेरे सिमट जायेगा,
गूंजेंगे भौंरे फिर इधर उधर
हर कली फूल बन के शर्माएगा,
देख लेना फिर सूरज
खिल खिला के मुस्कराएगा।
कल कल बहती नदियां
झरझर शोर मचाता झरना
शांतचित्त होकर बहता जायेगा,
कोहरे की चादर में लिपटा
अपनी ऊंचाइयों में जकड़ा
पहाड़ भी घुटनों के बल आएगा,
देख लेना फिर सूरज
खिल खिला के मुस्कराएगा।
ऊंचे महलों में रहने वाले
घमंड में मदमस्त चूर मखमल पहनने वाले
अकड़ में ऐंठ कर भी
आसमान की ऊंचाइयों में
जितना मर्जी उड़ ले
एक दिन गुरुर जमीन पर उतर आएगा,
देख लेना फिर सूरज
खिल खिला के मुस्कराएगा।
रोक लो कितना भी सूरज को
घने काले बादलों से ढककर
रोशनी छटकर एक दिन
सबको नजर आयेगी,
वक्त भी घूमेगा एक दिन
अपना पहिया लेकर
औकात खुद ब खुद सबकी
आईने में सबको नजर आयेगी ।
शोर बेशक तुम कितना मचा लो
नकाबों में मुंह अपना छिपा लो
तुम्हारी हर हरकत करतूतों को
तुम्हारी सीरत ही खुद बताएगी,
जो दफ़न राज किए तुमने
वो सबके सामने एक दिन आएगा
देख लेना फिर सूरज
खिल खिला के मुस्कराएगा।
षड्यंत्रों में मुझे उलझाना चाहो
हसरतों में गिराना चाहो
दूसरों की नजरों में बुरा बनाकर
दो कितनी भी गालियां उलहाने मुझे,
ओजस्व दिन ब दिन मेरा
निखर कर सामने सबके आएगा,
देख लेना फिर सूरज
खिल खिला के मुस्कराएगा।
