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Dr Jogender Singh(jogi)

Romance

3.2  

Dr Jogender Singh(jogi)

Romance

सुर्ख़ी

सुर्ख़ी

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58


लब सिलने का सिलसिला , कुछ यूँ चला

न मेरी आह निकली , न तेरी आह।

साँसो में न कोई फ़र्क़ रहा , 

जिस्मों ने ,मगर प्यार की गवाही दे दी।

सुर्ख़ी का लबों की तेरी, कुछ यूँ बँटवारा हुआ

न वो तेरी रही , न मेरी रही। 

हक़ बराबर का , बराबर की ज़िम्मेदारी

खो कर वजूद अपना अपना

 दोनो को मिल गयी , दुनिया सारी ।



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