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Ravi Purohit

Romance

4  

Ravi Purohit

Romance

सुनो मन के बसंत

सुनो मन के बसंत

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मन के रेगिस्तान में

तुम्हारी आहट

जैसे रेत के धोरों की 

नीली लहराती सलवटों में


ऊंट के पद-चिह्न

या कि जैसे निर्जन खंडहर में

बजी हो शहनाई

तरन्नुम में।


मैं बन जाऊं कागज़

तुम नेह की कलम बन

महकाती रहो इसकी रूह को।


बहुत मुश्किल है

अपनी आंवल नाल को 

काट फेंकना

किसी अपने से


दूर जाने का ख्याल 

कुछ इसी तरह डराता है मुझे

मेरा मन

तुम्हारे संदर्भों में।


तुम मेरे मन का बसंत

यूं ही बने रहना

मेरी आत्मा !


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