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Bhavna Thaker

Abstract

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Bhavna Thaker

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सुकून के कतरें

सुकून के कतरें

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चलो ख़्वाबगाह को खंगालते है सुकून के कतरें तलाशते, 

कुछ पल तो रुकती हैं ये सांसें भी 

पैर भी थकते हैं चलो थकान की सिलवटों की मारी उम्र को इस्तरी करके देखते हैं।

 

निरंतर बहती ज़िंदगी की आपाधापी में भूख के भीतर कहीं प्रार्थना छिपी होती है प्यास में फ़रियाद दबी होती है।

अहसान में लिपटी दया तो मौत से लिपटी आत्मा होती है, 

क्यूँ खयालों की खूबसूरती के बीच कहीं अवसाद की रंगोली सजी होती है।


इत्तू से दिमाग पर असंख्य खयालों का बोझ लदा है यूँ जैसे धरा के सिने पर जंगलों का राज।

इंसानी जिह्वा से दरिया की बूंदों के जितनी ख़्वाहिशे लिपटी है,

और सपनों के मजमें इतने जितने आसमान के आँचल में सितारें टांके है।


कुछ ख़्वाहिशें चमकती हैं कुछ टूटती हैं।

ज़िंदगी को हकिकत के आईने से देखों प्रतिबिम्ब ख़तरनाक है।

  

खुद को ज़िम्मेदारीयों से बेखबर रखना सुख की चरम सीमा है मुझे उस चरम को पाना है,

सुना है दौड़ती भागती वक्त की क्षितिज पर कहीं सुकूनगाह भी होते है... 

काश!ये चमत्कार वैज्ञानिक शोध में आविष्कार का रुप ले लें,मैं हाथ उठाऊँ और नेमत में खुदा सुकून दे दें।


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