STORYMIRROR

Abhishu sharma

Abstract

3  

Abhishu sharma

Abstract

सपने

सपने

1 min
167

अच्छे ख्वाब, बुरे सपने, होकर पराये भी

सिमटते हैं अंदर मेरे, जैसे हो अपने मेरे

सपने हमारी ज़िन्दगी की गाथा के

वह बिना पढ़े , छूटे से किस्से होते हैं

जिसे हर पल हमारी रूह मेहनत ,

किस्मत जैसे अनगिनत नगीनों की 

स्याही में डूबी कलम से

अनसुलझे धागे में पिरोकर

रंग रही होती है . 


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract