STORYMIRROR

Karishma Gupta

Tragedy

3  

Karishma Gupta

Tragedy

सपना "एक घर का"

सपना "एक घर का"

1 min
322

वो जिन्हें मैं बनाना चाहती थी अपना, 

हाँ संजोया था मैंने भी एक घर का सपना ।


कई बार उसने तोड़ा कई बार मैंने जोड़ा। 

मैं उम्मीद और विश्वास से बनाती,

वो बेवफाई, झूठ और छल से तोड़ जाता।


कौन कहता है कोशिश करो,

कोशिश करने वाला कभी हार नहीं पाता ।

अब हारी हुई मैं न चाहती हूँ कोई अपना,

अब हारी हुई मैं न चाहती हूँ कोई अपना,

माफ करना 

अब न देखूंगी कोई सपना,

अब न देखूँगी कोई सपना।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy