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Rajiv Jiya Kumar

Abstract Romance

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Rajiv Jiya Kumar

Abstract Romance

संगिनी

संगिनी

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मैं अकेला

मुसाफ़िर जीवन का

हलाहल पीता चला चला

संग जब तुम आए

संगिनी बन जीवन के

प्रेम का प्याला मुझे मिला।।

तेरे आंचल तले

गम के सारे सिले

पिघलते चले गए 

हँसी होंठों पर बिखर 

निखरती चली गई 

तुम संगिनी जिन्दगी की

जिन्दगी से फिर कैसा गिला।।


संगिनी तुम बिन 

अर्द्ध मानुष रहा यूँ ही पड़ा

जुड़ कर संगिनी तुम मुझसे

पूर्णता मुझे दे दिया

मुझ मानव को

जीवन का हर रंग

हर रूप में तुमसे मिला।

तुम साथ जब 

मेरे हाथों में तेरा हाथ जब 

हर मुश्किल सरल दिखता है

चले संगिनी मेल यह 

जन्म जन्म कई जन्म तक

क्या खूबसूरत है यह सिलसिला।।

संगिनी तुम संग तो चैन 

संगिनी तुम बिन रूह बेचैन।।


 



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