समृद्धि और अभिमान
समृद्धि और अभिमान
क्या समृद्धि अभिमान का द्वार है?
इस बारे में आपका क्या ख्याल है
माना समृद्धि आने के बाद मानव सबसे सहज नहीं हो पाता है।
कोई उससे कुछ मांग ना ले यही सोचकर घबराता है।
कई बार तो वह अपने मूल चरित्र को भी भूल जाता है।
लोग कहते हैं वह अपने रिश्तेदार और दोस्तों से भी कतराता है।
माना यह सही भी होता है!
लेकिन कभी सोचा है कि ऐसा क्यों होता है?
समृद्धि आने के बाद क्यों बढ़ जाता है हर मानव में अहंकार?
कृपया फिर से करें विचार।
उस मानव ने सबको अपनी समृद्धि को दिखाया होगा।
यथासंभव किसी की सहायता करके उसे अपनाया भी होगा।
अपनी उपलब्धियों के बारे में खुशी-खुशी सबको बतलाया भी होगा।
लेकिन किसी ना किसी ने उसका फायदा भी उठाया होगा।
मुश्किल है अपनी लकीर को बड़ा करना किसी ने उस की लकीर को मिटाया भी होगा।
देकर उसे अभिमानी का नाम, उसका नाम बदनाम भी कराया होगा।
हां ,इतना जरूर है कि समृद्धि आने के बाद उस मानव ने भी ऐसे लोगों से अपना पीछा ही छुड़ाया होगा।
समृद्धि अभिमान का द्वार है, कर्मठों ने नहीं, अपितु आलसियों ने ही यह नारा बनाया होगा।
