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अंकित शर्मा (आज़ाद)

Abstract Others

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अंकित शर्मा (आज़ाद)

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समंदर किनारे जो लहर पुकारे

समंदर किनारे जो लहर पुकारे

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बैठकर समंदर के किनारे

लहरों को पास बुलाया है

तुम जानो क्या, इसी शोर से

दिल को सुकूं दिलाया है 


भूलूं कैसे तुमको कह दो

कोई तरकीब तो बतलाओ

मिटेगी कैसे तस्वीर हृदय से

मुझको कुछ तो समझाओ 

अब तन्हाई को साथी अपना

दिल से मैंने अपनाया है

तुम जानो क्या, इसी शोर से

दिल अपना बहलाया है

बैठकर समंदर के किनारे

लहरों को पास बुलाया है


रेत और लहरों का मिलना

कितना प्यारा लगता है

लहरों का उठना और गिरना

कितना न्यारा लगता है

हार बनाकर लहरों का

शायद तुमने ही पहनाया है

इसी ख्याल से जाने कब से

दिल को सुकूं दिलाया है 

बैठकर समंदर के किनारे

लहरों को पास बुलाया है। 



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