STORYMIRROR

Manju Saini

Abstract

4  

Manju Saini

Abstract

शीर्षक:पराजिता सी मैं

शीर्षक:पराजिता सी मैं

1 min
325

जीवन चक्र में गतिमान

मैं और शरीर को साथ लिए

मैं चेतना के संगम में डूबती हुई

विचारधारा के प्रवाह में जीवन लिए

विरुद्ध दिशा में बहता पानी सा अहम लिए

उम्र के अंतिम पड़ाव पर पहुंच भी नहीं समझी

कि क्यों और कैसे हित हैं यह विलय और

एक प्रश्न टीस देता है अंत में कि आखिर क्यों..?

जीवन मिला, क्यों जीया, क्यों जाना, क्यों फिर से आना

मुझे लगता है जैसे मैंने प्रश्न की सूची ही निर्मित कर ली हैं

तुम्हें भी यहीं आना है हम सब को बार बार हर बार क्यों..?

पर तुम मिलकर फिर शरीर से भूल ही जाते हो कि

क्या है प्रकृति का नियम क्यों हैं ये सब

नदी के पानी की गहराइयों में डूबा सा अन्तःमन मेरा

विलीन हो जाता हैं जैसे समुद्र का पानी

पराजिता सी मैं आती हूँ जीवन चक्र में पुनः पुनः

कदाचित यही क्रम एक जन्म दर जन्म चलता है

हमें महासागर से जीवन में अपने को जानना है

अतल तल तक जाकर स्वयं को जानना कि 

कौन हूं आखिर मैं..

और तब कहीं जाकर स्वयं के साथ हो सकता है न्याय

हमें जीवन को शरीर के साथ मिलकर पहचानना हैं

चिर निद्रा में विलीन हो उससे पहले ही मैं कौन हूँ

क्यों हूँ, कब तक हूँ, कहाँ हूँ, किसके लिए हूँ

ये सब प्रश्न शांत करने हैं

प्रश्न बहुत है …

कब तक पता नहीं..



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract