सम्मोहन
सम्मोहन
सम्मोहन
उन हाथों का स्पर्श भुलाना
मेरे बस की बात नहीं है,
उन शब्दों का स्पर्श भुलाना
मेरे बस की बात नहीं है।
वह भावों से विगलित वाणी,
वह नयनों से प्यार मुखर,
वह उर समीप लाकर धीरे से
कम्पित कर स्पर्श तुम्हारा।
तुममें मैं खोयी खोयी
यह कैसा उन्माद जगाया।
आकर मेरे कोमल मन में
यह कम्पित कर स्पर्श तुम्हारा।
सारे बन्धन मैं भूल चली
तुम में जग को भूल चली
हर आहट पर याद तुम्हारी
अपने को ही भूल चली।
यह कैसा सम्मोहन है
यह कैसा आकर्षण है
पल पल ध्यान तुम्हारा,
कम्पित कर स्पर्श तुम्हारा।

