सिसकती
सिसकती
रेंग कर चलना, डर कर सिकुड़ना !
बंद हो जाना खोल में, सिकुड़ कर !
अंधेरी दुनिया बसा लेना जतन से !
फिर रो लेना , सिसकी भर कर !
कहानी दोहराई जाती रोज ,बदल बदल कर !
पृष्ठभूमि वही, कलाकार वही !
नाटक का मंच दोहराया जाता !
दर्शक भी कोई नया ,नजर नहीं आता !
देहरी पार की अजनबी दुनिया !
अजनबी चेहरों को देखती , खिड़की से झाँक कर !
पलट कर आ जाती फिर खो जाने को ,
रंगहीन संसार के अंधेरे कोने मे बैठ !
सिसक / सिसक कर रोने को !
तुम देवी हो, हो अन्नपूर्णा !
इसी भ्रम में जीने को मजबूर !
दर्द रंग बिरंगे ढोती, बेचारी !
अंधेरे कोने मे सिसकती नारी !!
