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Dr Jogender Singh(jogi)

Tragedy

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Dr Jogender Singh(jogi)

Tragedy

सिसकती

सिसकती

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रेंग कर चलना, डर कर सिकुड़ना !

बंद हो जाना खोल में, सिकुड़ कर !

अंधेरी दुनिया बसा लेना जतन से !

फिर रो लेना , सिसकी भर कर ! 


कहानी दोहराई जाती रोज ,बदल बदल कर !

पृष्ठभूमि वही, कलाकार वही !

नाटक का मंच दोहराया जाता !

दर्शक भी कोई नया ,नजर नहीं आता !


देहरी पार की अजनबी दुनिया !

अजनबी चेहरों को देखती , खिड़की से झाँक कर !

पलट कर आ जाती फिर खो जाने को , 

रंगहीन संसार के अंधेरे कोने मे बैठ !

सिसक / सिसक कर रोने को ! 


तुम देवी हो, हो अन्नपूर्णा !

इसी भ्रम में जीने को मजबूर !

दर्द रंग बिरंगे ढोती, बेचारी !

अंधेरे कोने मे सिसकती नारी !!



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