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Alok Singh

Romance

4  

Alok Singh

Romance

सिर्फ तुम -(03)

सिर्फ तुम -(03)

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मैं इश्क़ की बूंदों में लिपट कर

तुमसे मिलने आता हूँ

कभी धूप तो कभी छाँव बनकर

तुमसे मिलने आता हूँ


तुम कहते हो कि

मैं बदल सा गया हूँ

मैं तो सदियों से

इश्क़ में नज़र आता हूँ

इन बादलों पर लिखता रहता हूँ


इश्क़ की आयतें

इश्क़प्यासी ज़मीन पर

उकेरता हूँ इश्क़ की रुबाइयाँ

तुम कहते हो कि

मैं गुमशुदा सा हो गया हूँ


पर मैं तो ज़र्रे ज़र्रे में मुस्कुराता हूँ

हर कहानी की मैं ही शुरुआत हूँ

वैसे मैं स्वयं ही हर अंजाम हूँ

फिर भी तुम कहते हो

कि मैं कहाँ हूँ


मैं इश्क़ की वर्णमाला से

अनजान हूँ

पर मैं तो

खामोशियों की आवाज होता हूँ

हर मौसम में


इश्क़ की बरसात होता हूँ

हाँ ...मैं हूँ ..इश्क़ हूँ

और इश्क़ के रमज़ान में

इश्क़ की पहचान होता हूँ।


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