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Vijay Kumar parashar "साखी"

Drama Tragedy

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Vijay Kumar parashar "साखी"

Drama Tragedy

"श्रमिक व्यथा"

"श्रमिक व्यथा"

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श्रमिक व्यथा कोई भी न जाने

सबके सब है, स्वार्थी अफसाने

हम करे कड़ी मेहनत दिन-रात

फिर भी लोग हमें देते है, ताने


यह सब ऊंची-ऊंची इमारतें

हमारी श्रम बूंदों के है, आईने

श्रमिक व्यथा कोई भी न जाने

सब अमीरों की यहां बाते माने


सरकार भी न सुने, हमारे गाने

भीख न, काम दे जाने-पहचाने

ऐसी गुजारिश हम श्रमिक करे,

हमें मिले बस सही मेहनताने


हमें न चाहिए करोड़ों की खाने

दो वक्त की मिल जाये हमें रोटी,

शिक्षा की मिल जाये हमें ज्योति,

यही मांग रहे श्रमिक, हम खजाने।



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