शब्द बोलते है
शब्द बोलते है
एक शाम कैनवस पर सारे रंग गिर कर बिखर गए
कुछ भी समझ ना आया, यह कौन सा चित्र था..?
जो उभरने वाला था..! जिंदगी के पन्नों पर
लुढ़कते रंग, जो अपने आप मेरे जेहन में आकर
कुछ उकेर गई, अचंभा था..!
अद्भुत, आश्चर्य आश्चर्य
और लाख कोशिशों के बाद भी
कैनवस पर फिर नहीं उभरी वो आकृति ...!
सब कुछ अप्रत्याशित था ,
कुछ ने कहा मॉडर्न आर्ट..!....है..!
कुछ ने लीपा पोती का नाम दिया
सबने अपने मुताबिक कैनवस देखा./
जो देखना चाहा वही दिखा...!
पर यहां भी मैं हार गई
मुझे कुछ नजर नहीं आया..
जिस आकृति को लेकर मन ने
कैनवस पर रंगों को समायोजित करने का,
जो प्रयोजन किया था../
आज भी सब अनुत्तरित प्रश्न के रूप में
मेरी तूलिका, मेरे सतरंगी इंद्रधनुष के रंग और कैनवस
मेरे साथ खोज करते हैं...
वो क्या और कैसा कल
और उसका क्या मिज़ाज था...।
वो खुश दिखाई देता और
अंतस के रंगों में गमगीन दिखता है./
कैनवस पर सारे रंग आ गिरे हैं ...
काला और सफेद खो गया है./
(मुझे पता है काला और सफेद रंग नहीं होता है )
विडम्बना है सब प्रश्नों का
जवाब नहीं मिलता कैनवस से.../
आह...! ओह .! उफ़.. वेदना... बस.....!
मन की पीड़ा कहीं रंग न बदल दे...!
