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Jay Kumar Savita

Drama Fantasy Romance

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Jay Kumar Savita

Drama Fantasy Romance

शाम फिर घिरेगी

शाम फिर घिरेगी

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शाम फिर घिरेगी,

चाय की चुस्कियों के साथ,

मुलाकात होगी पुरानी यादों से,

चलो, इसी बहाने,

हाल-ए-दिल पूछ लेंगे।


कुछ तुम सुनाना अपनी,

कुछ हम गुनगुना लेंगे,

लम्हों की खारी के साथ,

चाय की चुस्की लगा लेंगे।


वैसे चाय तो एक बहाना है,

तुमसे मुलाकात का,

बहाना बनाता भी क्या,

किसी दूसरे बहाने से।


शायद तुम नहीं आओ,

एक चाय ही तो थी,

तुम्हारे मेरे मिलने का,

पहला ज़रिया।


याद है मुझे वो दिन,

कॉलेज के बाहर,

चाय की छोटी सी थड़ी पर,

चुस्कियाँ लेते हुए,

पहली बार तुम्हे देखा था।


किसे पता था उस दिन,

की चाय इतनी,

किस्सागोई कह जायेगी,

तुम्हरा दिन चाय से शुरु होता था।


दोपहर, शाम, रातें

चाय,तुम्हारा इंतज़ार करती रहती,

तो सोचा चाय को ही कहा जाये,

तुम्हें नेह निमन्त्रण देने का।


पहले कभी एक मौका मिला था,

चाहा था, सुबह की प्याली तुम,

अपने हाथों से बनाओगी,

पर अब दिल में मलाल है।


तुम्हारी चाय शायद किसी,

और को पसंद आ गई थी,

जिसे तुम्हारे घरवालों ने,

चाय पर बुलाया था।


नहीं पता अब रात-दिन,

कहाँ कटते हैं मेरे,

हर शाम चाय की,

चंद चुस्कियाँ,

तुम्हारी यादों के साथ।


मेरे अन्तरमन को,

छूती हुई ऐसे ही,

बेमन से उतर जाती हैं,

इस गले से नीचे।


हर घूँट जैसे दास्तानें,

तुम्हारी कह रहा हो,

इसी बहाने मैं,

हर रोज़ तुमसे मिल आता हूँ।


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