STORYMIRROR

Shravani Balasaheb Sul

Abstract

4  

Shravani Balasaheb Sul

Abstract

सबर...

सबर...

1 min
471

पटाखों की चमक एक पल की,

बाद में सब धुआँ धुआँ हैं

लगता हैं बादल उतरा हैं जमी पे,

नजर पे यह क्या असर हुआ हैं


भूल के सारे मस्त नजारे,

इसी दृश्य में यह दिल खो गया

पर हवा में देखो धुआँ गुम गया,

जमी के साथ तो धोका हो गया


प्यार महज एक झूठ हैं,

उसे लगा यही दस्तूर था

मगर धुएं को बादल समझ बैठी,

यह जमी का ही कसूर था


बस एक नजर की दूरी पे,

जिंदगी का हसीं पल हैं

क्षितिज पे देखो क्या समा हैं,

जमी को छूता बादल हैं


उस किनारे पे ठहरी वह,

तो जिंदगी की नई पहल हो गई

बादल को जवाब मिल चुका,

जब मिट्टी की हलकी सी हलचल हो गई


बारिशों का किनारा हैं जमी,

बादल का उस पे साया हैं

एक दूसरे से भले दूर हैं,

फिर भी एक दूजे को पाया हैं


फलसफा कहानी का है कि,

आँखों में परखती नजर रखो

मिल ही जाएगा हमसफर सफर में,

दुआओं में थोड़ा सबर रखो



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract