सामने तुम रहो
सामने तुम रहो
क्या पता आपने फिर बुलाया होगा
नई उम्मीद का एक नया दीपक जलाया होगा
भली लगी थी मुझे यकायक किरण कोई
चाँद ने चाँदनी को पास बुलाया होगा
सवेरा बुहत दूर है मेरी आँखों से कोई
सुनहरे ख्वाब ने शायद लुभाया होगा
नदी चुपचाप चूमने लगी किनारों को
न जाने कितना उसमें प्यार समाया होगा
सामने तुम रहो बस
एक तमन्ना है मेरी
कहां फिर कर्ज मोहब्बत
का बकाया होगा।

