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MANISHA JHA

Tragedy

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MANISHA JHA

Tragedy

साजिश

साजिश

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बिना दस्तक दिए ये जो आजमाइशें आती हैं

साथ अपने ढ़ेर सारे गम की पुड़िया लाती हैं

काश ये अपनी कुण्डली साथ लाती

कब तक घर मेरे रहेंगी बता पाती।

तो इनकी खातिरदारी मेहमानों सा मैं करती

रोज इनको लजीज व्यंजन अपने हाथों से पड़ोसती

खीर, पुए, लड्डू, बताशे से मुँह मीठा कराती

अफ़सोस मगर.. ये कभी ना जाने वाले पड़ोसी सा

घर में मेरे पैर पसारे बैठी है, जकड़ रखा है जंजीरों सा।

इसके तेवर, मिजाज सब अलग ही हैं

ये समझ ना आने वाली एक पहेली है

खुशियों को बुझाने वाली मेरी सहेली है

ये घर में आग लगाने वाली कोशिश है

नजरें चुराने वाली एक साजिश है।

सबसे छिप कर कब तक रहूंगी मैं

अब मेरा दिल बैठा जा रहा है....

डर है कि सब्र का बाँध ना टूट जाए

सभी अजीज रिश्ते ना पीछे छूट जाए 

ये मुश्किलें.. एक दिन अपने मायके जाएगी 

पर मेरे वजूद को ख़ाक करके ही जाएगी।



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