रथयात्रा
रथयात्रा
ये उड़ीसा राज्य की पावन धरा ,जगन्नाथपुरी धाम।
जिसे धरती का बैकुंठ कहा,कर लो सभी प्रणाम।।
विग्रह रूप में ये तीनों विराजे ,जगन्नाथपुरी नाम।
श्री जगन्नाथ,बहन सुभद्रा,साथ में भाई बलराम।।
विश्व कर्मा जी ने प्रतिमाओं का किया था निर्माण।
दर्शन मात्र से भक्तों का भी,हो जाता है कल्याण।।
हवा के विपरीत झोकों में,धर्म - ध्वजा लहराती।
क्या राज छुपा है,यह बात समझ में नहीं आती।।
चहुॅंदिशा में सिंह,अश्व,व्याघ्र और हस्ति के द्वार।
प्रवेश द्वार के दोनों ओर,भगवत प्रसाद बाजार।।
सूर,तुलसी,और मीरा भी दर्शन करने पुरी जाते।
गोरखनाथ,नानक देव,कबीर ,महिमा सारे गाते।।
महा प्रभु की महा रसोई,छप्पन भोग भी चढ़ता।
मनोकामना होती पूरी,हरि के दर्शन जो करता।।
आषाढ़ शुक्ल द्वितीया का, होता है पावन दिन।
"रथ यात्रा" महोत्सव भी हर वर्ष,होता है रंगीन।।
काष्ठ खंडों से तीन रथ का निर्माण होता अनुपम।
जगन्नाथ,बलभद्र,सुभद्रा, ये होता रथों का क्रम।।
रस्सी पकड़ रथों को भक्तजन,आगे उसे बढ़ाते।
भक्तजन दर्शन करते,अवसर का पुण्य कमाते।।
रथ यात्रा के नगर भ्रमण में,जब गूॅंजेंगे जयकारे।
श्रीजगन्नाथ के दर्शन करने,जाऍंगे मिल के सारे।।।।
