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Surendra kumar singh

Abstract

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Surendra kumar singh

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रोज कोई आता है

रोज कोई आता है

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रोज कोई आता है

मेरे घर के सामने

फूलों से लदे पेड़ की

डालियाँ हिलाता है

फूल झड़ते हैं

और महक उठता

घर आंगन और

खलिहान।

रोज कोई आता है

ढूंढ लाता है

न जाने कहाँ कहाँ से

मेरी बिखरी हुयी

ख्वाहिशें,

नये नये गीत

नये नये राग

और नयी नयी

कहानियां

छलक उठता है

खुशियों का जाम रोज

मेरे घर के सामने।


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