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Sudershan kumar sharma

Romance

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Sudershan kumar sharma

Romance

रंजोगम

रंजोगम

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हम तो तैयार थे मान जाने के लिए, 

कोई आया ही नहीं मनाने के लिए। 


लोग ही काफी थे, बहकाने के लिए, आ गए कुछ हमें भी आजमाने के लिए। 

लफ्ज ही नहीं थे होठों पे लाने के लिए, सोच, सोच के क्या कहता कुछ बताने के लिए। 


गबां दी रातों की नींदें भी

ज्यूं सुस्ताने के लिए, बचा ही क्या है अब आजमाने के लिए। 


बैसे भी कम नहीं हैं रंजोगम यूं मनाने के लिए, 

ढूंढ लेता हुं कुछ पल मुस्काने के लिए। 


पेश रहते हैं हर जगह रस्में निभाने के लिए, हंस लेते हैं तो भी, कुछ पल सबको दिखाने के लिए। 


था, मन में शिकवा भी अगर , हमने कब मना किया था दिवार लगाने के लिए, शिकवा बस इतना कि कुछ जगह छोड़ देते आने जाने के लिए। 

आओ अब भी अगर याद तो क्या करें, कौन सी कोशिश न की आपको भुलाने के लिए। 


जन्म लिया है दूनिया दारी के बाजार मैं तो जरूरी है साथ एक दुसरे से निभाने के लिए। 

दूरियां, दरमियां अपनों के खटकती हैं बहुत सुदर्शन, कौन से करें जतन अपनों

को मनाने के लिए। 



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