STORYMIRROR

Akshat Shahi

Abstract

4  

Akshat Shahi

Abstract

रंग

रंग

1 min
448

रंग भरने आयें हैं मकान में आपके 

कुछ रोज़ अब यहीं रहेंगे 

समझेंगे ख़ाली दीवारों के मतलब 

उतारेंगे खिड़कियों से पर्दों का बोझ 


बेरंग दरवाज़ों को खोल कर देखेंगे 

दिखाएँगे कितनी रौशनी है बाहर 

रौशनी की हर लकीर में रंग गिनवाएँगे 

दरवाज़े खोल कर रखेंगे दिन भर 


फूल पत्तियों के साथ मिट्टी को अंदर बुलाएँगे 

जब जीने की आदत पड़ जाएगी तुमको 

तब निकालेंगे खीसे से अपने रंग 

फिर खुद चुनना तुम दीवार हर रंग के लिए 


चौगाठो में अलग रंग भरेंगे 

खिड़कियों के शीशों में अलग भरेंगे 

हरा केसरी लाल सब रंग भरेंगे 

फिर पर्दों की भी ज़रूरत नहीं रहेगी 


अंदर आती हर किरण का रंग अलग दिखेगा 

तुम पाओगे हर रंग में एक सी गरमाहट है। 


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract