मर्ज
मर्ज
1 min
155
दिल का मर्ज तासीर बनता गया
वो दवा बदन को देते रहे।
घावों का सूखना आदत हो गई
वो मरहम का रंग देखते रहें।
आंखों का छलकना सरेआम हो गया
वो दर्द के नाम खोजते रहे।
तेरा होना चाहत से जरूरत बन गया
वो जरूरत के दाम खोजते रहे।
अब छपवा दो मेरा काम तमाम हो गया
वो खबर का इन्तेजार ना करते रहे।
