STORYMIRROR

Rajeshwar Mandal

Inspirational

4  

Rajeshwar Mandal

Inspirational

रिश्वत

रिश्वत

1 min
319

जब मैं सरकारी सेवक था

मेरा अलग ही तेवर था

छात्र जीवन का मृदुभाषी गुण

पता नहीं कहां गायब था


बात बात में तुनक जाते 

हर बात में अड़ जाते थे

गुण दोष को रख हाशिए पर

सही ग़लत का निर्णय

सिक्कों से तौल जाते थे


दुआ बद्दुआ दोनों खड़े समक्ष

मतिभ्रष्टा मैं बद्दुआ चुनता था

भूख लगी थी चंद सिक्कों की

रिश्र्वत संग आहें बटोर लाता था


कोई रोता रहा होगा रात भर

रिश्र्वत में जायदाद बेचकर

और मैं जेवरात खरीदने के खातिर

छुप छुप कर रात भर पैसे गिनता था


अर्जित तो बहुत किया

फिर भी कर्ज में डूबा रहा

वेतन के पैसे से घर चलता था

रिश्वत के पैसे डाक्टर ले जाता था


मैं समझता रहा शुक्र है रिश्र्वत की

जिन पैसों से मेरा जान बचा

पर ये शायद मेरा भ्रम होगा

हो सकता है रिश्वत न लेता तो

रंग बिरंगी बिमारी ही न होता


और जब मैं रिटायर हुआ

ऐसा लगा जैसे हवा विहीन टायर हुआ

पहले लोग देखकर मैं चिढ़ता था

अब मुझे देखकर लोग चिढ़ता है


वन में खिले फूल की तरह

दशा हो गई है मेरी

जो न ईश पग चढ़ सका

और न पुष्प प्रिय के हाथों टूट सका


जब मैं सरकारी सेवक था

मेरा अलग ही तेवर था...


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Inspirational