रिश्वत
रिश्वत
जब मैं सरकारी सेवक था
मेरा अलग ही तेवर था
छात्र जीवन का मृदुभाषी गुण
पता नहीं कहां गायब था
बात बात में तुनक जाते
हर बात में अड़ जाते थे
गुण दोष को रख हाशिए पर
सही ग़लत का निर्णय
सिक्कों से तौल जाते थे
दुआ बद्दुआ दोनों खड़े समक्ष
मतिभ्रष्टा मैं बद्दुआ चुनता था
भूख लगी थी चंद सिक्कों की
रिश्र्वत संग आहें बटोर लाता था
कोई रोता रहा होगा रात भर
रिश्र्वत में जायदाद बेचकर
और मैं जेवरात खरीदने के खातिर
छुप छुप कर रात भर पैसे गिनता था
अर्जित तो बहुत किया
फिर भी कर्ज में डूबा रहा
वेतन के पैसे से घर चलता था
रिश्वत के पैसे डाक्टर ले जाता था
मैं समझता रहा शुक्र है रिश्र्वत की
जिन पैसों से मेरा जान बचा
पर ये शायद मेरा भ्रम होगा
हो सकता है रिश्वत न लेता तो
रंग बिरंगी बिमारी ही न होता
और जब मैं रिटायर हुआ
ऐसा लगा जैसे हवा विहीन टायर हुआ
पहले लोग देखकर मैं चिढ़ता था
अब मुझे देखकर लोग चिढ़ता है
वन में खिले फूल की तरह
दशा हो गई है मेरी
जो न ईश पग चढ़ सका
और न पुष्प प्रिय के हाथों टूट सका
जब मैं सरकारी सेवक था
मेरा अलग ही तेवर था...
