घृणा
घृणा
खुदा के बनाये
सब बंदे हैं
इस दुनिया में
सब में विराजमान उसका अंश तो
फिर किसी से
घृणा कैसी लेकिन
समय रहते
अपने सामर्थ्य को
पहचानते हुए
जीवन में अपने लक्ष्य को
प्राप्त करने के लिए
एकाग्र मन से
संयमित होकर
जुटे रहना चाहिए
प्रेम, घृणा
ऐसे न जाने कितने ही
भावों को समझते हुए पर
किसी से बहुत अधिक
प्रभावित न होते हुए या
इन भावों के भंवर के जाल में
न फंसते हुए
खुद को कष्ट न देते हुए
इन सबसे ऊपर उठते हुए
अपने को किसी साधना में
लगाते हुए
घृणा को तलहटी में
दबाते हुए
प्रेम के सागर की लहरों को
आकाश की तरफ उछालें
सागर के किनारे तक लेकर आयें।
