रिश्तों को संभालो
रिश्तों को संभालो
कहां तय होता है पहले से ज़िंदगी में कुछ भी,
अगले पल के मोहताज है यहाँ हर कोई.!
अच्छे समय पर इतराओ नहीं बूढ़े
रिश्तों से हाथ छुड़ाओ नहीं,
अपनों से उम्मीद नहीं यकीन रखो
मुनाफ़े की आस नहीं ताउम्र का साथ रखो.!
सबके दिल में दर्द रहता है
कोई मुझे समझ नहीं पाया,
खुद से कोई सवाल क्यूँ नहीं करता
कि तू कितनों को समझ पाया.!
मुश्किल की घड़ी में अपनों का हमारा हाथ
थामना ब्याज है बोई हुई फ़सल का,
अपनेपन के खाद से सिंचा करो रिश्तों को.!
मिलावटी रिश्तों का दौर है मुखौटे से सजे चेहरे से
असलियत उधड़ भी जाए तो क्या,
प्रेम के धागे से रफू लगाकर रिश्ते पहन लिया करो.!
खुद को खास दूसरों को आम ना समझो,
अहं के धुँए में बिखरे रिश्ते फिर हर कोई
तलाश करता है सब कुछ लूट जाने के बाद ही।
