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डॉअमृता शुक्ला

Abstract Others

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डॉअमृता शुक्ला

Abstract Others

रात ढलने को है

रात ढलने को है

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रात ढलने को है चांद चलने को है

कुछ पता ही नहीं अभी तक तुम आए नहीं। 

मन परेशान सा, सोच भटका रही

बेचैन ढूंढ़ती हैं नज़र, साया दिखे तो कहीं।


नींद से बोझिल हुईं पलकें झपकाए नहीं।

कुछ पता ही नहीं अभी तक तुम आए नहीं। 

दर पे दस्तक हुई कदम वहाँ बढ़ चले

पर वो थी चंचल हवा जो मुझसे छल करे।।


 थरथरायी आवाज़ शब्द गुम हो गए 

कुछ पता ही नहीं अभी तक तुम आए नहीं। 


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