रात आयी
रात आयी
रात आयी,हंसी, कह गयी है
मुस्कराने के दिन आ गये हैं
आंधियां दर्द की आयें ,जायें
खिलखिलाने के दिन आ गये हैं।
फूल खिलता था जो बाग में वो
खिल उठा है हमारी गली में
राह पथरायी सी जो खड़ी थी
चल पड़ी जैसे कोई नदी है
रात आयी गयी कट गयी है
चहचहाने के दिन आ गये हैं।
रोज आकाश आता था सूरज
कालिमा जगमगाती सुबह सी
आ गये देवता छोड़ मंदिर
जिंदगी मौज ही हो गयी है
जिनको रुकना ही था वो रुके भी
ये मचलने के दिन आ गये हैं।
बेखयाली का मंजर नहीं ये
धड़कने दे रही हैं गवाही
मौन चीखा, रहा अनसुना ही
जिंदगी अनकही सुन रही है
जिनको सच भी लगे झूठ से ही
उनसे मिलने के दिन आ गये हैं।
