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Madhu Vashishta

Classics Inspirational Thriller

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Madhu Vashishta

Classics Inspirational Thriller

राममई हो गया

राममई हो गया

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राम राम जपत राममई हो गया।

सुन के रामधुन मेरा मन भी था खो गया।

नाच नाच राम धुन पर बावरा सा हो गया।

निर्विकार निर्विचार थोड़ी देर हो गया।


भूल गया ईर्ष्या द्वेष, मैं तो प्रेम मगन हो गया।

सुलझ गई सारी उलझनें मेरा शांत मन हो गया।

प्रभु जी ऐसा नाचा मैं

तुम्हारे दरबार में ही कहीं खो गया।

राम, लखन, सिय जी के साथ-साथ

हनुमान जी का दर्शन भी हो गया।

राम राम जपते मैं तो राम मई हो गया।


लोगों ने जगाया मुझे ,मैं तो जाने कहां पर सो गया।

संसार से हट गया था चित्त मेरा,   

मैं तो आकाश में ही था कहीं विलीन हो गया।

फिर से सुनाओ रामधुन मैं काहे को हूं जग गया।


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