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Shweta vishal Jha

Drama Others

4.5  

Shweta vishal Jha

Drama Others

पुष्प और नारी

पुष्प और नारी

1 min
273


वो अपने भावों में गुमसुम,

थी उपवन में शांत खड़ी l

देखा जो इक सुमन सुकोमल,

अनायास ही बोल पड़ी l


तुम शोभा हो उपवन की,

तुम सामग्री पूजन की, 

यही तुम्हारा कार्य सुमन

यही है नियति जीवन कीl


विमल मनोहर पंखुड़ियां,

आकर्षण का केंद्र बनें l

बिखरा दो इतना सौरभ,

प्रमुदित नर सुख भोग सकें l


विचलित हो ना जाना तुम,

बूंदों के आघात से l

रवि किरणें जब चुमेंगी,

दमक उठेगा गात ये l


हो प्रहार जब कीटों का

शांत, मौन हो सह लेना l

तुम को यह अधिकार नहीं,

पाकर कष्ट व्यथित होना l


जीवन के अंतिम क्षण में तुम,

बीजों का निर्माण करोगे l

मुझ से हो उत्पन्न अनेकों,

कहते - कहते मुरझाओगे l


उसकी इन बातों को सुनकर,

बड़ा अचंभित पुष्प हुआ l

रमणी, कैसे ज्ञात तुम्हें,

ये तो है मेरी पूर्ण व्यथा l

वह बोली, बंधु इस पीड़ा की,

मैं भी सहभागी हूँ l

अन्तर हममें मात्र यही है

तुम हो पुष्प..., मैं नारी हूँ..... ll   



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